Hindi poetry
खेल तो बस खेल है,सबको इसे खेलना है,
एक तोड़े नियम भले,औरों को इसे पालना है।
हार हो या जीत हो,मुस्कुरा कर झेलना है,
गिरे जो साथी राह में,हाथ देकर उठाना है।
मैदान की इस जंग में,दिल को साफ़ रखना है,
दुश्मनी को भूलकर,बस खेल भावना को रचना है।
आज तक मैं हर शख़्स से
मोहब्बत के साथ पेश आता रहा,
जिन्हें मेरी परछाई से भी परहेज़ था
दुआओं में उन्हें ही माँगता रहा।
जब ठंडी हवाएँ, इस बदन को छूकर जाती हैं,
तुमसे मिलने की बेचैनियाँ,मेरी रूह को तड़पाती हैं।
बेताब हो जाता है जी, मेरा तुम्हारे दीदार को,
धड़कनें बस तुम्हारी तरफ़, चलने की ज़िद करती हैं।
मोहब्बत दोनों की होती है,
तो निभाना भी दोनों को पड़ता है,
महबूब की सांसों की खातिर,
खुद को मिटाना भी पड़ता है।
तुम्हारा रूठना भी तुम जैसा ही नादान लगता है,
मुझे देखे बिना रहना तुम्हें आसान लगता है,
छुपाती हो जो गुस्सा तुम वो झूठी बेरुख़ी है बस,
ये भोला प्यार ही तो रूह का अरमान लगता है।
भीगी पलकों को जो पोंछ सके,
ऐसा कोई अपना पास होना चाहिए,
जो सुख-दुख को आधा कर दे,
ऐसा कोई बेहद खास होना चाहिए।
ज़ुबाँ खोलो तो कहते हैं बहुत बोलता हूँ मैं,
ख़ामोश बैठूँ तो समझते हैं कोई ग़म छुपाता हूँ मैं।
जब भी हिम्मत करता हूँ अतीत में झाँकने की, इजाज़त मिल जाती है तब आँसुओं को बह निकलने की।
होठों पे आए अल्फाज़ों को तेरी तरफ भेजता नहीं,
याद आ ही जाएँ अगर यादें तो दिल में भी समेटता नहीं।
पास जो था तेरे,
तूने उसी को अपनी तक़दीर मान लिया,
मैं ढूंढता रहा उसे जो था ही नहीं,
और खुद को फ़क़ीर मान लिया।
जो मिला सहज ही...
जो मिला सहज ही मैं उसे, राख करके चला गया,
अपना ही घर मैं खुद, जलाकर चला गया।
अंजलि में जो था बहुत कुछ, मैं छोड़ता चला गया,
और उसकी तलाश में मैं, अतीत में भागता रहा
संभाले थे जो आँसुओं के, सैलाब मैंने इन आँखों में,
उन्हें सुख की महफ़िल में ही, बहाकर चला गया।
कालिख़ जमी है फिर, इस दिल पर आज,
मैं सुख के दीप सारे, बुझाकर चला गया।
ढूँढता हूँ जिन सायों को, मैं धूप के कदमों पर,
उन्हीं दरख्तों की जड़ें मैं, काट कर चला गया।
जिन्होंने मुझे फूलों की तरह, सँभाला था कभी,
उन अपने ही लोगों को, मैं दुखाकर चला गया।
हाथ जोड़े खड़ा हूँ मैं, आज खुद के ही सामने,
मैं खुद को ही मुसीबत में, फँसाकर चला गया।
डर किसका इसमें अब? ख़त्म हुई उम्मीद भले ही,
खेल यह जिंदगी का, मैं ही जीतकर चला गया!
— संदीप गजे
वो जादू बिखेरती रातें आज भी दिल के पास है,
तुम्हारी हर धड़कन का आज भी मुझे अहसास है।
जो अनकहीं बातें तुम्हारे दिल में छुपी थीं,
उनका मेरे होठों पर आना आज भी बेहद ख़ास है।
संदीप गजे....
निशाना अगर मछली की आँख पर न हो,
तो तीर का तरकश से निकलना बेकार है,
मंज़िल को पाने की तड़प ही न हो,
तो उस सफ़र पर चलना ही बेकार है।
दिल में जीतने का जुनून और हौसला हो,
तभी तो हर बाज़ी खेलने का असली मज़ा है,
बिना किसी मकसद के बस यूँ ही खेलना,
खुद के हुनर को दी गई एक सज़ा है !
जो डर कर कदम पीछे हटा ले यहाँ,
वो खिलाड़ी भला कहाँ कुछ कर पाता है,
जो चुनौतियों से आँखें मिलाता रहे,
कामयाबी का परचम वही लहराता है।
संदीप गजे....
मोहब्बत का हुनर तुमने ही तो सिखाया है,
मोहब्बत से मोहब्बत को जोड़ना तुमने ही तो सिखाया है।
एक नए रिश्ते को मुकम्मल करने के लिए,
एक पुराना रिश्ता तोड़ना
तुमने ही तो सिखाया है।
मोहब्बत से पुकारे कोई तो, हम मुस्कुराते हैं।
कोई दिल जब दुखाता है, तो आँसू आ ही जाते हैं।
नाराजगी का नाटक वो बखूबी करती है,
पास बुलाऊं तो मुंह फेर कर खड़ी होती है,
पर जैसे ही बढ़ाता हूँ हाथ गले लगाने को,
सब भूलकर मेरे सीने से आ लिपटती है।
याद है न? —
चिड़ी-चिड़िया की वो कानाफूसी,
एक-दूसरे के कानों में कहना,
याद है न? —
उस उम्र में ... हमारा वो पागलों जैसा रहना।
तितलियों के पीछे भागते हुए,
काँटों की परवाह न करना,
याद है न? —
उस उम्र का... हमारा वो पागलों जैसा रहना।
घर का मतलब मालूम न होते हुए भी,
रेत के घरौंदे में जी जान लगाना,
याद है न? —
उस उम्र का... हमारा वो पागलों जैसा रहना।
बरगद का पत्ता-पत्ता,
बारिश में भीगकर तृप्त हो जाता,
याद है न? —
आसरे को खड़े,हम दोनों को वो कितना भिगोता।
तुम्हारी आँखों के आँसुओं को,
मेरी उंगलियों से चुनना,
याद है न? —
हमारा वो झूठा सा झगड़ा, उसी पल मिट जाना।
टूटते हुए तारे को देखकर,
दुआओं की झोली फैलाना,
याद है न? —
आँखें मूँदकर एक दूजे को, अपनी हर मन्नत बनाना।
वो चिड़िया, वो बारिश,
वो बरगद की ठंडी छाँव,
याद है न? —
जो सिर्फ बचपन था, उसका 'मोहब्बत' बन जाना।
— संदीप गजे
अलविदा" कहकर
मुझसे मुँह मोड़ लेती हो,
क्यों?
इस दिल को सज़ा देती हो!
न अब यूँ रोज़ मिलने का सिलसिला रखा जाए,
मगर ये कहते-कहते आँख उसकी नम हो जाए।
जुदाई का वो फ़ैसला तो उसका अपना था,
मगर सुनाते वक़्त हर लफ़्ज़ काँपने लग जाए।
वो कहती थी कि अब फ़ासले ही बेहतर हैं,
पर यही कहते हुए दिल तिल-तिल बिखर जाए।
उसे भी गँवारा कहाँ था बिछड़ना
गले मिलकर वो रोए तो क़यामत ढह जाए।
संदीप गजे.....
उसे तो बेहद मोहब्बत थी प्यारी बारिश से,तभी तो हमने भी बारिश को उसपे बरसने दिया।
थी एक साथ भीगने की जो कमबख़्त आरज़ू मेरी,उस एक ख़्वाहिश को दिल में ही बस सिसकने दिया।
संदीप गजे.....
कुछ यादें...
कुछ यादें, कब की छूट गईं,
कुछ यादें,दिल से ही चिपक गईं।
वक्त की आंधियों में न जाने,
कितनी तस्वीरें मिट गईं।
जो मुकद्दर में थीं लिखी,
वह यादें यहीं रुक गईं।
कुछ यादें-दिल से ही चिपक गईं।
ढूँढता रहा जिन्हें मैं उम्र भर,
राहें जाने कहाँ मुड़ गईं।
अनजानी सी थीं जो मंजिलें,
खुद आकर हमसे जुड़ गईं।
कुछ यादें-दिल से ही चिपक गईं।
चेहरे पर हँसी का मुखौटा रहा,
पर आँखें अंदर ही अंदर रो पड़ीं।
दफन थी जो गम की दास्तान,
वो महफिल में अचानक खुल गईं।
कुछ यादें-दिल से ही चिपक गईं।
जख्म वक्त ने दिए थे मुझे,
यादें बनकर फिर उभर आए।
जिन्हें भुलाने की जिद थी मेरी,
वो बातें फिर से संवर गईं।
कुछ यादें-दिल से ही चिपक गईं।
शिकवे-शिकायतें थीं अपनों से,
वो खामोशी की चादर में छुप गईं ।
जब देखा पलटकर जिंदगी को मैंने,
तो सारी कड़वाहटें पानी सी बह गईं।
कुछ यादें-दिल से ही चिपक गईं।
मिला सफर में जो भी वह सब कुबूल है,
हसरतें दिल की अब थम गईं।
बीत गया जो वो कल था,
आज खुशियाँ दामन में बिखर गईं।
फिर भी कुछ यादें-दिल से चिपक कर ही रहे गईं।
संदीप गजे
दो थके हुए दिल
मिलन की चाह मे जलते हैं,
जाति का मुद्दा उठते ही
ठंडे पड़ जाते हैं।
दो रूहों की चाहत
जाति की दीवार से टकराती है;
लाचार आत्मा खुद को
'जाति' के जाल में फंसा पाती हैं।
'जाति' नाम की एक दीवार
हमारे मिलने के बीच खड़ी है,
दिल मे यही अफ़सोस है -
इसे तोड़ने के लिए तु साथ नहीं है।
- संदीप गजे
पसंद आए जो चीज़, पहले उसका दाम देखते हैं,
वही लेते हैं हम, जो अपनी हैसियत में होती हैं।
खिलौना देखकर बच्चे मचलते हैं तो क्या,
समझदारी तो बस ख़र्चों की गिनती में होती हैं।
संदीप गजे....
खुशियाँ लाख मिले पर --
दिल से मुस्कुराया नहीं जाता,
ग़म के इन आँसुओं को --
आँखों में छुपाया नहीं जाता।
दर्द की दास्तां ---
बयां करे भी तो कैसे,
हाल-ए-दिल ---
हर किसी को सुनाया नहीं जाता।
खोई हुई चीज़ों को पाने में ही, सारा जीवन बीत गया,
हाथों में आई रेत की तरह, हर एक लम्हा फिसल गया।
आख़िरी सांस के आते होश आया तो ये देखा,
दामन में जो कुछ सिमटा था, वो भी तो छूट गया।
संदीप गजे....
-जादुई रात-
आज भी याद हैं मुझे वो रातें जादुई,
तेरे दिल की भावनाएँ मेरे होठों पर उतर आई।
बिना कुछ कहे भी सब कुछ समझ गए हम,
खामोशी कह गई वो बातें जो दिल में थीं छुपी।
कपूर की तरह जलती रही हर सांस हमारी तब,
बाँहों में हमारी सुलगती वो आशाऐं पिघल गई।
चाँद भी ठहरा था आसमान के आँगन में तब,
चाँदनी भी थी हमारी मुलाकात से मुस्कुराई।
स्पर्श तेरा था जैसे कोई झोंका रेशमी हवा का,
शर्माकर महफ़िल सितारों की आसमान में बिखर गई।
साँसों में उलझ गई साँसें अपनी इस तरह,
होठों की पंखुड़ियाँ तेरे नाम से थरथराई।
आज भी तन्हाई में जगाता हूँ मैं उन यादों को,
आज भी हैं पलकें ख़्वाबों से भीगी हुई।
दूर भले ही हैं आज हम फिर भी यादों में है,
आज भी वो हसीन रातें दिल में है बसी हुई।
- संदीप गजे



























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